देश में एथेनॉल-मिक्स्ड फ्यूल को तेजी से अपनाया जा रहा है। इसे पेट्रोल के एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इसके साथ एक बड़ी चिंता भी सामने आ रही है- पानी की कमी। दरअसल एक्सपर्ट्स का मानना हैं कि एथेनॉल बनाने में पानी का अत्याधिक इस्तेमाल होता है। ऐसे में डर है कि इससे देश में पहले से चल रही पानी की समस्या और बढ़ सकती है।
हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट ने देशभर में चिंता बढ़ा दी है। भारत में क्लीन एनर्जी बनाने की कोशिश में पानी की किल्लत बढ़ रही है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे भविष्य में बड़ा संकट आ सकता है।

गन्ने और चावल की खेती बढ़ा रही जल संकट
`एथेनॉल बनाने में पानी की बहुत बर्बादी हो रही है। यही मुख्य चिंता है। रिपोर्ट के अनुसार, महज एक लीटर एथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर तक पानी खर्च हो सकता है। खासकर चावल और गन्ने जैसी फसलों से इसे बनाना पानी की भारी बर्बादी है। भारत में इथेनॉल का बड़ा हिस्सा गन्ने से बनता है। इस फसल को उगाने में भी भारी मात्रा में पानी लगता है।
ऐसे में, हर एक लीटर इथेनॉल के लिए हज़ारों लीटर पानी खर्च होता है। जिससे आगे चलकर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
NITI Aayog की सख्त चेतावनी
वर्तमान भारत में भूजल की स्थिति काफी चिंताजनक है। हाल ही में नीति आयोग ने चेतावनी दी है कि दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई समेत 21 बड़े शहरों में 2030 तक भूजल खत्म हो सकता है। दूसरी तरफ देश में एथेनॉल बनाने की फैक्ट्रियां बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि कई प्लांट ऐसे इलाकों में लगाए जा रहे हैं। जहां पहले से ही पानी की भारी किल्लत है।
इस बीच, कम पानी वाले क्षेत्रों में एथेनॉल बनाना भविष्य के लिए और भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है।
महाराष्ट्र और अन्य राज्यों पर बढ़ता दबाव
बता दें कि महाराष्ट्र पहले से ही गंभीर पानी की कमी से जूझ रहा है। राज्य के विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे इलाके लंबे समय से सूखे का सामना कर रहे हैं। अब यही राज्य इथेनॉल उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में उभर रहे हैं। यह एक काफी गंभीर समस्या है। जिन इलाकों में पीने के पानी की कमी है, वहीं पानी की ज्यादा खपत वाला फ्यूल भी बनाया जा रहा है।
इसी तरह, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक भी ग्राउंडवाटर पर निर्भर हैं। लेकिन वहां वाटर लेवल पहले से ही काफी कम है।
भोजन और ईधन पर छिड़ी नई बहस
देश में अनाज और फ्यूल की प्राथमिकता पर बहस बढ़ गई है। अब फसलों का इस्तेमाल खाना बनाने की बजाय ईंधन बनाने में किया जा रहा है। भारत सरकार एथेनॉल बनाने के लिए चावल का कोटा लगातार बढ़ा रही है। हर साल इसके लिए नए और बड़े टारगेट रखे जा रहे हैं। इससे लोगों को डर है कि कहीं आने वाले समय में अनाज कम न पड़ जाए। भारत की खेती पहले ही खराब मौसम और पानी की कमी झेल रही है। ऐसे में अनाज से ईंधन बनाना हमारे भोजन को प्रभावित कर सकता है।
60-Word Summary:
भारत में पेट्रोल के विकल्प के तौर पर एथेनॉल को अपनाया जा रहा है। लेकिन इसे बनाने में पानी की भारी बर्बादी सबसे बड़ी चिंता है। एक लीटर एथेनॉल के लिए हज़ारों लीटर पानी खर्च हो रहा है। नीति आयोग के मुताबिक कई शहरों में भूजल खत्म होने की कगार पर है। अब सवाल उठ रहा है कि ईंधन बनाने के होड़ कहीं पानी और खाद्य सुरक्षा पर भारी न पड़ जाए।
