सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे पर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि ‘ओपन एक्सेस’ व्यवस्था के तहत बिजली खरीदने पर रेलवे को बिजली सरचार्ज देना होगा। रेलवे इससे बच नहीं सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से एक बड़ा विवाद खत्म हो गया है। दरअसल यह कानूनी विवाद पिछले 10 साल से भी ज्यादा समय से चल रहा था।

रेलवे को सरचार्ज भुगतान का आदेश
अदालत ने एक और अहम बात कही है। कोर्ट के मुताबिक, बिजली कानून (Electricity Act, 2003) के तहत भारतीय रेलवे को सिर्फ एक ‘कंज्यूमर’ माना जाएगा। ऐसे में उसे ‘डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी’ का दर्जा नहीं मिल सकता।
यही कारण है कि रेलवे को भी बाकी उपभोक्ताओं की तरह ही काम करना होगा। उसे क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज (CSS) और एडिशनल सरचार्ज (AS) का भी पेमेंट करना होगा।
रेलवे पर बढ़ सकता है बड़ा आर्थिक बोझ
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से भारतीय रेलवे की बिजली खरीद लागत बढ़ सकती है। भारतीय रेलवे देश के सबसे बड़े बिजली उपभोक्ताओं में शामिल है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेलवे हर साल 33 अरब यूनिट से ज्यादा बिजली इस्तेमाल करता है। वही, बकाया और सरचार्ज मिलाकर यह कई हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। रेलवे के अनुमान के मुताबिक, बकाया रकम करीब 15,000 करोड़ रुपये हो सकती है।
साल 2015 से चला आ रहा कानूनी विवाद खत्म
इस विवाद की शुरुआत साल 2015 में हुई थी। तब रेलवे ओपन-एक्सेस पावर मार्केट से सीधे बिजली खरीदना चाहता था। वह बिजली खरीद पर लगने वाले सरचार्ज से बचना चाहता था। इसके लिए रेलवे ने खुद को ‘डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी’ घोषित करने की मांग की।
रेलवे का तर्क था कि उसके पास अपना बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर है। यहां तक कि मजबूत ट्रैक्शन सिस्टम भी मौजूद है। इसी दलील के आधार पर रेलवे ने सरचार्ज से पूरी छूट मांगी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले पर लगाई मुहर
2015 में केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग ने रेलवे के पक्ष में फैसला दिया था। हालांकि, कई राज्यों के इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटर्स और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों ने इसे चुनौती दी। इसके बाद बिजली अपीलेट कोर्ट ने 2024 में पुराना फैसला पलट दिया।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि रेलवे को बिजली वितरक नहीं। बल्कि उपभोक्ता माना जाएगा। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को सही माना है।
रेलवे सिर्फ कंस्यूमर, सप्लायर नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ‘बिजली सप्लायर’ वाली दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि रेलवे बिजली बेचता नहीं है। वह इसका इस्तेमाल सिर्फ अपने लिए करता है। ट्रेनों को चलाने, सिग्नल सिस्टम और स्टेशनों के लिए यह बिजली इस्तेमाल होती है।
फैसले में कहा गया कि वितरण लाइसेंस होल्डर वह होता है, जो अलग-अलग ग्राहकों को बिजली सप्लाई करता है। हालांकि रेलवे ऐसा कोई काम नहीं कर रहा है।
बिजली कंपनियों के लिए राहत भरा फैसला
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को राज्य की बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। DISCOMs का कहना था कि रेलवे को सब्सिडी मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है।
क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज की मदद से कंपनियां सस्ती दरों पर बिजली देने का खर्च संभालती हैं। इसमें एग्रीकल्चरल और डोमेस्टिक कंज्यूमर को दी जाने वाली बिजली भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट ने बिजली कंपनियों को बकाया सरचार्ज निकालने को कहा है। यह भी कहा कि इलेक्ट्रिसिटी कंसम्पशन के हिसाब से रेलवे को पूरा बिल जारी किया जाए।
60-Words Summary:
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने कहा कि ‘ओपन एक्सेस’ से बिजली खरीदने पर रेलवे को सरचार्ज देना होगा। अदालत ने रेलवे को Electricity Act, 2003 के तहत सिर्फ बिजली उपभोक्ता माना है। इससे कई साल पुराना विवाद खत्म हो गया है। इस फैसले से रेलवे पर करीब ₹15,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है। कोर्ट ने बिजली कंपनियों को बकाया राशि का पूरा बिल जारी करने के निर्देश दिए हैं।
