College की पढ़ाई से क्यों दूरी बना रहे भारतीय छात्र? सामने आई बड़ी वजह


Bhawna Mishra

Bhawna Mishra

Sep 06, 2026


भारत की हायर एजुकेशन सिस्टम को लेकर एक चिंता की बात सामने आई है। ग्रेजुएशन यानी कॉलेज में एडमिशन लेने वाले छात्रों की संख्या कम हो रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में देश भर में ग्रेजुएशन में एडमिशन लेने वाले छात्रों की संख्या में करीब 93,000 की कमी आई है।

देखने में यह डेटा छोटा लग सकता है। लेकिन इसके असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत जैसे तेजी से आगे बढ़ रहे देश में तो उच्च शिक्षा में छात्रों की संख्या हर साल बढ़नी चाहिए थी। हालांकि, कुछ राज्यों के हालात तो इससे भी ज्यादा हैरान करने वाले हैं।

महाराष्ट्र में कम हुए कॉलेज एडमिशन

महाराष्ट्र में कॉलेज लेवल पर नॉमिनेशन में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज हुई। 2022-23 में अंडरग्रेजुएट कोर्स में 36.89 लाख छात्रों ने एडमिशन लिया था। वही 2023-24 में यह संख्या 35.04 लाख रह गई। 

यानी एक साल में करीब 1.85 लाख छात्रों की कमी आई। यह गिरावट इसलिए भी अहम है क्योंकि महाराष्ट्र देश के आर्थिक और व्यावसायिक रूप से मजबूत राज्यों में शामिल है।

वोकेशनल कोर्स में भी नहीं बढ़ी दिलचस्पी

मुंबई, पुणे, नासिक और औरंगाबाद जैसे शहरों में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर का मेजर हब है। मुंबई और पुणे जैसे बड़े शहरों में नौकरियों की कोई कमी नहीं है। और ज्यादातर अच्छी नौकरियों के लिए ग्रेजुएशन होना बहुत जरूरी होता है। 

चौंकाने वाली बात यह है कि छात्र पढ़ाई छोड़कर अचानक दूसरे कोर्स या डिप्लोमा की तरफ भी नहीं जा रहे हैं। यहां तक कि शॉर्ट-टर्म और वोकेशनल कोर्स में भी कोई खास एडमिशन नहीं हुए हैं।

क्या डिग्री अब पहले जैसी जरूरी है?

कई परिवारों के लिए हायर एजुकेशन सिर्फ पढ़ाई नहीं। बल्कि एक आर्थिक फैसला भी है। स्टूडेंट्स और पेरेंट्स बेहतर नौकरी, अधिक कमाई और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद में सालों का समय और बड़ी रकम खर्च करते हैं। लेकिन जब इन फायदों की गारंटी कम होने लगे, तो यह फैसला भी बदलने लगता है। 

घर की आमदनी कम है। पढ़ाई का खर्च बढ़ गया है। अच्छी नौकरी मिलना मुश्किल है। इन वजहों से अब डिग्री की वैल्यू कम हो रही है। अब डिग्री देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि छात्र काबिल है या नहीं। 

डिग्री की जगह स्किल को प्राथमिकता

आम तौर पर डिग्री देखकर कंपनी को लगता था कि कैंडिडेट ने पढ़ाई पूरी कर ली है और वह काम के काबिल है। हालांकि अब एजुकेशन क्वालिटी ठीक नहीं है। इतना ही नहीं, कोर्स भी पुराने हो चुके हैं।  ऐसे में डिग्री सिर्फ नाम की रह गई है। 

इस हालात से छात्र और कंपनियां दोनों परेशान हैं। छात्र सोचने लगे हैं कि कॉलेज में इतने साल खराब करने का क्या फायदा? वहीं, कंपनियां डिग्री की बजाय काम और स्किल्स को तवज्जो दे रही हैं। इससे पढ़ाई और नौकरी के बीच की दूरी और बढ़ सकती है।

शिक्षा और रोजगार के बीच तालमेल जरूरी

कुल मिलाकर, केवल ज्यादा बच्चों को कॉलेज भेजना ही काफी नहीं है। असली सवाल एजुकेशन क्वालिटी का है। क्या कॉलेज ऐसी शिक्षा दे रहे हैं, जो स्टूडेंट्स के समय और पैसों की कीमत चुका सके? कमज़ोर कॉम्पिटिश, पुराना सिलेबस और लिमिटेड इनोवेशनकॉलेज की वैल्यू कम कर रहे हैं। 

ऐसे में अगर कॉलेजों ने खुद को अपग्रेड नहीं किया, तो छात्र और उनके परिवार कॉलेज की पढ़ाई छोड़ सकते हैं।  उन्हें यह भी लग सकता है कि इससे अच्छा तो कॉलेज जाना ही बंद कर दें।

इसलिए भारत में कॉलेज की पढ़ाई में आ रही इस गिरावट को सिर्फ आंकड़ों का हवाला देकर देकर टाला नहीं जा सकता। यह एक बड़ी चेतावनी है। इससे स्पष्ट है कि देश में एजुकेशन क्वालिटी और उससे मिलने वाली जॉब के बीच तालमेल को सुधारने की सख्त जरूरत है।

60-Words Summary:

भारत में कॉलेज एडमिशन में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है। 2023-24 में करीब 93,000 कम छात्रों ने एडमिशन लिया। महाराष्ट्र में यह गिरावट करीब 1.85 लाख रही। वोकेशनल कोर्स में भी खास बढ़ोतरी नहीं हुई। स्टूडेंट्स अब डिग्री के साथ स्किल्स पर भी फोकस कर रहे हैं। ऐसे में कॉलेजों के लिए एजुकेशन क्वालिटी सुधारना जरूरी होगा।


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She is a seasoned writer with a passion for Storytelling and a keen interest in diverse topics. With 2.5 years of experience, she excels in writing about Tech, Sports, Entertainment, and various Niche topics. Bhawna holds a Postgraduate Degree in Journalism and Mass Communication from St Wilfred’s College of Jaipur.

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