गुजरात के सूरत में ‘गांव चलो आंदोलन’ के बीच हजारों प्रवासी मजदूर घर लौटने लगे हैं। इनमें उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर बड़ी संख्या में शामिल हैं। टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी इंडस्ट्रीज में बढ़ते तनाव के बीच काम की स्थिति, वेतन में कटौती और साप्ताहिक छुट्टी जैसे मुद्दे चर्चा में हैं।
हालांकि, मजदूरों के घर लौटने की वजह सिर्फ कामकाज से जुड़ा तनाव नहीं है। यह पलायन दिवाली और छठ पूजा से पहले हो रहा है। इस दौरान कई प्रवासी मजदूर त्योहार मनाने अपने घर लौटते हैं।

क्या है ‘गांव चलो आंदोलन’?
सूरत में ‘गांव चलो आंदोलन’ के जरिए प्रवासी मजदूर अपनी आवाज उठा रहे हैं। इस कैंपेन के तहत मजदूरों को अपने गांव लौटने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य कामकाज से जुड़ी समस्याओं पर फैक्ट्री ओनर्स का ध्यान खींचना है।
अक्टूबर 2026 की शुरुआत में यह अभियान चर्चा में आया। उस समय लेबर लॉ लागू करने और पुराने वादों को लेकर मतभेद बढ़ गए थे।
इस दौरान कई लेबर यूनियन ने कहा है कि अगर उनकी डिमांड पूरी नहीं होती हैं, तो मजदूर अपने गांव में लंबे समय तक रुक सकते हैं। इससे फैक्ट्रियों में वर्कर्स की कमी हो सकती है।
यह अभियान सिर्फ मजदूरों के सूरत छोड़ने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य लेबर लॉ का पालन करना और मजदूरों की तकलीफें दूर करना है।
छुट्टी और वेतन को लेकर मजदूरों कि शिकायतें?
इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले कुछ मजदूरों ने काम की स्थितियों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि उनसे लंबे समय तक काम कराया जाता है। आराम के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता और साप्ताहिक छुट्टी की भी कोई व्यवस्था नहीं है।
वही कुछ लेबर्स का आरोप है कि छुट्टी मांगने पर उनके सैलरी में कटौती की गई। वहीं, वर्किंग कंडीशंस के खिलाफ आवाज उठाने वाले कुछ कर्मचारियों को नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा।
फिलहाल, मजदूर श्रम नियमों को लागू करने की मांगहै। इनमें साप्ताहिक छुट्टी और वेतन से जुड़े नियम शामिल हैं। इस बीस, यूनियन ने कर्मचारियों को शिकायत दर्ज कराने और फैक्ट्री मालिकों को लेकर जवाब मांगने को कहा है। हालांकि, ये आरोप मजदूरों के बयानों पर आधारित हैं। इनकी पुष्टि के लिए जांच जरूरी है।
क्या मजदूरों को सच में छोड़ना पड़ रहा है गुजरात?
बताते चलें की इस समय सूरत और उधना रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की भारी भीड़ देखी जा रही है। इसे देखते हुए ऐसी चर्चा है कि बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर गुजरात छोड़कर जा रहे हैं।
हालांकि, कई मजदूर दिवाली और छठ पूजा मनाने के लिए अपने गांव लौट रहे हैं। वे हर साल त्योहारों के दौरान ऐसा करते हैं। इसलिए, घर लौटने वाले यात्रियों की बढ़ती संख्या की एक बड़ी वजह त्योहार भी हैं।
वहीं, मजदूरों और फैक्ट्री ओनर्स के बीच बढ़ते तनाव ने इस मामले को और सुर्ख़ियों में ला दिया है। ऐसे में कहा जा सकता है की कुछ मजदूर काम की स्थितियों से परेशान होकर घर लौट सकते हैं। जबकि कई लोग त्योहार मनाने के लिए छुट्टी लेकर जा रहे हैं।
सूरत के कपड़ा उद्योग में मजदूरों का बड़ा योगदान
सूरत भारत के बड़े टेक्सटाइल सेंटर में से एक है। यहां की फैक्ट्रियों और वर्कशॉप्स में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर काम करते हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार और दूसरे राज्यों से आए लोग शामिल हैं।
ये मजदूर मशीनें चलाने, कढ़ाई करने और कपड़ा बनाने जैसे कई काम संभालते हैं। ऐसे में फैक्ट्री के रोजमर्रा के कामकाज में भी उनकी अहम भूमिका है।
अगर लंबे समय तक मजदूरों की कमी बनी रहती है, तो प्रोडक्शन स्केल पर असर पड़ सकता है। ऑर्डर समय पर पूरे करने और माल की डिलीवरी में भी देरी हो सकती है।
वहीं, मजदूरों के लिए उचित सैलरी, वर्किंग ओवर्स और साप्ताहिक छुट्टी जैसे मुद्दे अहम हैं। ऐसे में फैक्ट्री मालिकों और अधिकारियों को सुनिश्चित करना होगा कि यह विवाद समय रहते सुलझाएं, ताकि मामला और न बढ़े।
60-Words Summary:
सूरत के ‘गांव चलो आंदोलन’ ने मजदूरों की समस्याओं को फिर चर्चा में ला दिया है। कपड़ा और कढ़ाई उद्योग में लंबे कामकाजी घंटे, वेतन कटौती और छुट्टी न मिलने की शिकायतें हैं। इस बीच, कई प्रवासी मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार लौट रहे हैं। हालांकि, दिवाली और छठ पूजा भी इसकी एक बड़ी वजह हैं। मजदूरों के जबरन गुजरात छोड़ने की फिलहाल पुष्टि नहीं हुई है।
